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भले इंटरनेट ने मीडिया की दुनिया बदल दी हो. इंटरनेट क्रांति ने खबरों को पढ़ना सुलभ कर दिया हो. लेकिन अब भी परम्परागत तरीके से ख़बरों को पढ़ने का तरीका नहीं बदला है. अब भी सुबह की खबरों को पढ़ने के लिए अखबार का इंतजार रहता है. इसी संदर्भ में वरिष्ठ पत्रकार गिरीश पंकज ने अपने वॉल पर लिखा है :

Girish Pankaj : आँगन में अखबार न देख कर कुछ समय परेशान रहा कि आज का अखबार कहाँ चला गया? सहसा याद आया कि कल २६ जनवरी थी, अखबार की छुट्टी का दिन. अखबार हमारी दिनचर्या का अनिवार्य हिस्सा बन चुका है. जिस अखबार के हम आदी हो जाते है, उसे देखे-पढ़े बिना चैन नहीं पड़ता. अखबार न देखो तो अधूरापन लगता है. वैसे देश-दुनिया को जानने के लिए अब टीवी और इंटरनेट भी है, मगर अखबार देखने का अपना सुख है. इसे मैं इस तरह कहना चाहता हूँ कि 'नेट' पर अखबार देखना 'चम्मच से चावल खाना' है, मगर अखबार का प्रिंट संस्करण देखना 'हाथ से चावल खाने' जैसे आनंद से गुजरना है, मेरी बात वे लोग बेहतर समझ सकते है, जो चम्मच और हाथ से खाना खाने का आनंद या फर्क महसूस करते हैं.

प्रतिक्रिया में आयी कुछ टिप्पणियाँ :

Ambrish Kumar : गिरीश पंकज की अख़बार के बारे में रोचक टिपण्णी पढ़ी .आज यहाँ भी अख़बार नहीं आया .लखनऊ में छुट्टी भी कुछ ज्यादा होती है स्कूल की तरह .छत्तीसगढ़ में जब जनसत्ता शुरू करने के लिए स्टाफ का चयन कर रहा था तो छत्तीसगढ़ के वरिष्ठ पत्रकार राजनारायण मिश्र जिन्हें हम लोग दा कहकर बुलाते है उन्होंने कम्पोजिंग से लेकर हर विभाग में दो तीन मुस्लिम कर्मचारियों को रखवाया .तब उन्होंने बताया कि होली दिवाली में छत्तीसगढ़ के लोग ज्यादा छुट्टी लेते है और उस समय इनके चलते ही अख़बार निकल पाएगा इसका अनुभव होली आते ही हो गया जब आधा दफ्तर खाली हो गया . बहुत कम लोगों को पता होगा कि हमारे एक्सप्रेस समूह के पूर्व चेयरमैन रामनाथ गोयनका सुबह चार बजे अपने सुन्दर नगर वाले घर में तीनो अख़बार इंडियन एक्सप्रेस ,फाइनेंशियल एक्सप्रेस और जनसत्ता का इंजर करते हुए लंबे कारीडोर में टहलते रहते थे .अख़बार की पहली कापी उन्हें पहुंचाई जाती थी और देर होने पर जीएम कोहली की आफत आ जाती थी .

Pankaj Chaturvedi असल में पहले जब सारा आलम सोता था तो अखबारनवीस जगता था, ताकि सोने वालों को अँधेरे कि खबर कर सके, लेकिन अब अखबार का मालिक अँधेरे होने का इंतज़ार भी नहीं करता ---- सो उसे उस दिन छुट्टी कि ज़रूरत होती हे जब उसकी जरुरत सभी को होती है.

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