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दिलीप मंडल की नयी किताब पेड न्यूज़ पर 'मीडिया का अंडरवर्ल्ड' किताब के बाद स्वतंत्र पत्रकार और दलित चिंतक दिलीप मंडल की नयी किताब आ गयी है. इस बार निशाना कॉपोरेट मीडिया में होने वाले घपलेबाजी पर है.  किताब का नाम 'कॉरपोरेट मीडिया-दलाल स्ट्रीट' है. राडिया कांड के संदर्भ में इसमें पब्लिक रिलेशन, कॉरपोरेट कम्युनिकेशन और लॉबिंग के भारतीय मॉडल को समझने की कोशिश की गई है. किताब को राजकमल प्रकाशन,दिल्ली ने छापा है. अभी हार्डबाउंड में छपी है. पेपरबैक आने वाला है. हार्डबाउंड की कीमत 350 रुपए रखी गयी है.

दिलीप मंडल ने अपनी किताब में लिखा है :

"राडिया कांड मीडिया की ताकत और उसकी खामी दोनों को एक साथ दर्शाता है। ताकत इस बात की कि मीडिया जनमत बना सकता है, जनमत को बदल सकता है, लोगों के सोचने के एजेंडे तय करता है और खामी यह कि मीडिया पैसों के आगे किसी बात की परवाह नहीं करता।

मीडिया को पैसे वाले पैसा कमाने के लिए और ताकत के लिए चलाते हैं। इसलिए इसके दुरुपयोग की संभावना इसकी संरचना और स्वामित्व के ढांचे में ही दर्ज है। राडिया कांड से यह जगजाहिर हो गया कि खासकर ऊंचे पदों पर मौजूद मीडियाकर्मी पैसे और प्रभाव के इस खेल में हिस्सेदार बन चुके हैं। पिछले 20 वर्षों में मीडियाकर्मियों के मालिक बनने की प्रक्रिया भी तेज हुई है। कुछ संपादक तो मालिक बन ही गए हैं। इसके अलावा भी मीडिया संस्थानों में मध्यम स्तर पर काम करने वाले पत्रकारों तक को कंपनी के शेयर दिए जाते हैं। इस तरह उनकी प्रतिबद्धता को नए ढंग से परिभाषित कर दिया जाता है। पत्रकारों का ईमानदार या बेईमान होना अब उनकी निजी पसंद का ही मामला नहीं रहा। कोई पत्रकार अपनी मर्जी से ईमानदार नहीं रह सकता। यह बात कई लोगों को तकलीफदेह लग सकती है। राडिया कांड ने मीडिया को सचमुच गहरे जख्म दिए हैं।"

किताब को कई चैप्टरों में बांटा गया है , जो इस तरह से है :


1. राडिया टेप कांड: पत्रकार, लॉबिस्ट या पत्रकार-लॉबिस्ट

2. मीडिया स्कैम के दौर में विश्वसनीयता के प्रश्न

3. पीआर और कॉरपोरेट कम्युनिकेशन: पब्लिक है, पर सब नहीं जानती

4. लॉबिंग, मीडिया मोनोपली और पब्लिक स्फियर

5. राजनीति की पीठ पर मीडिया और पीआर की सवारी

6. सरकार की गोद और मीडिया की आजादी

7. मीडिया का धंधा और आम आदमी की विदाई

8. मीडियानेट, प्राइवेट ट्रीटी: तुम मुझे शेयर/पैसे दो मैं तुम्हें कवरेज दूंगा

9. रेगुलेटर की नाकामी और स्वनियंत्रण का क्षद्म

10. वैकल्पिक मीडिया और नागरिक पत्रकारिता: संभावनाएं और सीमाएं

अनुलग्नक 1. फेसबुक पर पत्रकारिता विमर्श

अनुलग्नक 2. एक मीडिया कंपनी जब पैसे जुटाती है

अनुलग्नक 3. लॉबिंग के धंधे की आचार संहिता

यह भी पढ़ें :

मीडिया का अंडरवर्ल्ड: एक समीक्षा

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