दिल्ली के बहुत ही कम ऑटो की पीठ कोरी बची है जिन पर कि आम आदमी पार्टी के विज्ञापन न चिपके हों. इस बात के लिए आप को शावाशी देनी चाहिए कि उसने भीड़भाड़ वाले शहर में एक ऐसे विज्ञापन स्पेस को खोज निकाला जो कि अब तक विज्ञापनदाताओं की नजर में नहीं आया था या जो थोड़े-बहुत विज्ञापन दिए भी तो नशामुक्ति और शर्तिया इलाज जैसे झोला छाप उपचार करनेवाले उपक्रम की ओर से. आप ने ऑटो की इस पीठ को राजनीतिक विज्ञापन के लिए असरदार स्पेस में तब्दील कर दिया.
लेकिन, गौर करें तो भ्रष्टचार मुक्त सरकार बनाने का दावा करनेवाली नई-नई बनी ये पार्टी अपने इस विज्ञापन के उस बुनियादी नियम और तरीके का खुलेआम उल्लंघन करती नजर आती है जिसका संबंध आमलोगों से है.
कंपनी की ओर से निकाले गए ऑटो के पीछे अनिवार्य रुप से पारदर्शी शीशे या प्लास्टिक होते हैं जिसे कि आप के इस बड़े पोस्टर से पूरी तरह ढंक दिया गया है. ये पारदर्शी जगह इसलिए छोड़ी जाती है ताकि बैठी सवारी के साथ अगर कुछ गलत हो तो पीछे से आ रहे लोग देख, उनका बचाव कर सकें.
ऑटो की पीठ पर पोस्टर के जरिए विज्ञापन में 'आप' ये भूल गई कि इसका लोग एक अर्थ ये भी लगा सकते हैं कि जो पार्टी पहले से पारदर्शी जगह को खत्म करने पर आमादा है, भला वो किस हद तक पारदर्शी होगी..और फिर सुरक्षा के लिहाज से ये उनके अधिकार का हनन भी है.
इधर विज्ञापन सामग्री पर गौर करें तो किसी तरह की रचनात्मकता या भीड़ से अलग विज्ञापन के बजाय योगेन्द्र यादव के सर्वे के आंकड़े ही इसकी कॉपी है जिसमे कि इस पार्टी की सरकार और मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल बनने जा रहे हैं.
विज्ञापन के लिहाज से ऐसे विज्ञापन बहुत ही निम्न स्तर के उत्पाद के लिए बनाए जाते हैं जहां उपभोक्ता के विवेक पर रत्तीभर यकीन किए बिना सबकुछ अपनी तरफ से थोप दिए जाते हैं जबकि मंहगे उत्पाद के विज्ञापन उनके चुनाव की क्षमता पर यकीन करते हैं.
गौर करें तो राजनीति से अलग विज्ञापन की दुनिया में ऑटो की पीठ की पारदर्शिता खत्म करने और सबकुछ अपनी तरफ से थोपने के कारण ये विज्ञापन एक घटिया नमूना है.
(मूलतः तहलका में प्रकाशित)

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