-सुजीत ठमके-
देश के लिए 8 नवंबर का दिन ऐतिहासिक है. उसी दिन देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक ऐतिहासिक ऐलान किया। ऐतिहासिक इसलिए क्योकि अमूमन आर्थिक मामलों से जुड़े ऐतिहासिक फैसलों का ऐलान आरबीआई गवर्नर , देश के वित्त मंत्री या फिर वित्त सचिव करते है। लेकिन देश के इतिहास में पहली बार प्रधानमंत्री खुद आगे आए और 500 और 1000 के नोट बंद करने का ऐलान किया।
फिर तो हर चैनल पर प्रधानमंत्री का भाषण अउर नोट-ही-नोट छा गए.चारो तरफ प्रधानमंत्री की कालेधन से लड़ने की दिशा में उठाये गए इस कदम की भूरी—भूरी प्रशंसा होने लगी. मीडिया के साथ-साथ आर्थिक क्षेत्र के विशेषज्ञ और अर्थशास्त्री भी न्यूज़ चैनलों पर गदगद दिखे।
लेकिन बदलते वक्त के साथ-साथ न्यूज़ चैनलों के स्क्रीन का रंग भी बदलने लगा और नोटबंदी के मुद्दे पर सकारात्मक ख़बरों की जगह नकरात्मक ख़बरें आने लगी. एटीएम पर खड़े लोगों की लंबी-लंबी लाइनें और लोगों का दर्द स्क्रीन पर बाईट की शक्ल में उभरने लगा.
मिला-जुलाकर अब हालात ये है न कि नोटबंदी के एलान के दो दिन बाद देश का मीडिया ही दो फाड़ हो गया है.एक इसे अच्छा फैसला बता रहा है तो दूसरा इसमें कमियां बताने में लगे हैं और दोनों ही इसके लिए आम जनता के बाईट का सहारा लेकर दर्शकों को असमंजस में डाल रहा है. आखिर निष्पक्ष माने तो किसे माने?
(सुजीत ठमके)
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