"जब भी कोई अकेला बोलता है उसका बोलना किसी भी भीड़ से बहुत बड़ा होता है। अकेला बोलने वाला कमज़ोर से कमज़ोर वक्त में, ताकतवर से ताकतवर सरकार के सामने एक उम्मीद होता है।" ... यह रवीश कुमार के आज के प्राइम टाइम का मुखड़ा था।
क्या शानदार कार्यक्रम था। हँसते, मुस्कुराते, कचोटते, कोसते रवीश। वे भावुक शख़्स हैं, इसलिए मैं सोचता था अपने भाई पर लगे आरोप (मुख्य आरोपी निखिल प्रियदर्शी की तो अब भी कोई मीडिया बात नहीं करता!) के बाद उन पर जो बेसिरपैर वाली टीका-टिप्पणी हुई, उससे कहीं उनके प्राइम टाइम ढील न आ जाए।
लेकिन रवीश उतने ही सहज़ हैं, विनोद और मारक अंदाज़ में, जैसे हमेशा थे। इस बात पर मुझे ख़ुशी की अनुभूति हुई और इंडिया टीवी के उस छछूंदर पत्रकार पर तरस आया, जो ख़ुद कहीं पहुँच नहीं पाया तो कुंठा में आसमान पर - दूसरे शब्दों में ख़ुद पर - ही थूकने लगा।
ज़रूर देखें गर देखा न हो - गुरमेहर के साहस और बेटियों के ज़ुबां खोलने की प्रेरणा।
(वरिष्ठ पत्रकार ओम थानवी के फेसबुक वॉल से)M
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