अभिरंजन कुमारआप लोग जानते हैं कि मैं जितना दुखी देश की विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका से हूं, उतना ही दुखी मीडिया से भी हूं। मीडिया का हिस्सा होते हुए भी मैं हमेशा यह मानता रहा हूं कि हमें और ज़िम्मेदार होना चाहिए और ऐसा मानने और उसपर अमल करने की अपनी कोशिशों के चलते लगातार इसकी कीमत भी चुकाता रहा हूं। यह छह पंक्तियां मैंने काफी पहले लिखी थीं, जिनमें से चार पंक्तियों को अब अपने "प्रोमो" में ढाला है। देखें- "बिके हुए बुद्धिजीवियों की फ़ौज से नहीं आएगी क्रांति मीडिया में ईमानदारी नहीं हो तो फैलेगा भ्रम, फैलेगी भ्रांति। देश के लोगों में होगा डर और अंधविश्वास का अंधेरा ग़रीबों, किसानों, महिलाओं, नौजवानों पर क़ातिल व्यवस्था का घेरा। चमकदार चेहरों से कुछ नहीं होगा, अगर भीतर ईमान ना हो सच्चाई ना हो, सोच ना हो और इरादों में जान ना हो।" दूसरों पर उंगली उठाते हुए हम मीडिया के लोग अपने गिरेबान में झांकना भूल जाते हैं। यह दुखद और निराशाजनक तथ्य है। यह जनता की जवाबदेही है कि वह मीडिया को भी ज़िम्मेदार होने के लिए प्रेरित करती रहे। (स्रोत-एफबी)
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