अभिषेक श्रीवास्तव
करीब सात साल पहले की बात है। अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय से पढ़ कर एक लड़की दिल्ली आई थी और तहलका में उसे इनटर्न रखा गया था। शायद छह महीने के भीतर उसे प्रोन्नति देते-देते स्पेशल करेस्पॉन्डेंट बना दिया गया। यहीं से उसकी दिक्कतें शुरू हुईं। उसका पुरुष मित्र अमन बिरादरी नाम के एक एनजीओ में काम करता था। उसके माध्यम से मुझे तरुण तेजपाल का काला चेहरा पहली बार दिखाया गया था।
मित्र राजेश चंद्र की पहल पर मंडी हाउस स्थित श्रीराम सेंटर में एक मुलाकात तय हुई, जिसमें मुझे बताया गया कि देर रात तरुण तेजपाल उस महिला पत्रकार को एसएमएस करते और फोन करते थे। अपनी गाड़ी में साथ चलने के लिए जबरदस्ती भी करते थे। उसे इनकार करने पर धमकियां भी मिलीं। उस महिला के पास सारे फोन कॉल रिकॉर्ड थे। सारे एसएमएस सुरक्षित थे।
हम लोग हमेशा की तरह कमज़ोर और छोटे लोग थे, तरुण तेजपाल के खिलाफ़ कुछ करने की सोचना बड़ी बात थी। हमने अमन बिरादरी के कुछ बड़े नामों से संपर्क किया, सीधे भी और किन्हीं माध्यमों से भी। जो अमन बिरादरी को जानते हैं, वे उसके बड़े नामों से भी परिचित होंगे। किसी ने हमारी बात पर विश्वास नहीं किया। वे दोनों इस दिल्ली से शायद डर गए। एफआइआर कराने या शिकायत करने की उनमें हिम्मत नहीं थी और हम लोग संसाधनविहीन बेरोज़गार लोग थे। हम कुछ नहीं कर सके।
आज जो कुछ हुआ है, वह हिंदी और अंग्रेज़ी (वर्ग) में उत्पीड़न के फ़र्क को दिखाता है। अलीगढ़ की वो साधारण सी लड़की अगर दिल्ली की अंग्रेज़ीदां होती तो शायद तरुण को तब ही प्रायश्चित्त करना पड़ जाता। ठीक वैसे ही, जैसे एक लड़की पूर्वोत्तर की है, अंग्रेज़ी और हिंदी दोनों से कमतर, सिर्फ इसलिए खुर्शीद अनवर अब तक सुरक्षित हैं।
(स्रोत-एफबी)
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