ओम थानवीटीवी की चर्चाओं में जाने में आलस्य आने लगा है। चैनल बहुत हो गए और रोज बुलावे आ जाते हैं। ढंग का चैनल हो तो बात और होती है, पर हैं कितने? दूरदर्शन और लोकसभा-राज्यसभा छोड़ दीजिए, प्राइवेट चैनलों में इक्के-दुक्के ही संजीदा हैं। बाकी पर लॉटरी खुल जाए तो खुल जाए, वरना घड़ी-भर बोलने का मौका मिलेगा और -- दिल्ली के ट्रैफिक से जूझते हुए -- लौट के चले आइए घर को। जिन्हें अपने चेहरे या वेश-भूषा के प्रदर्शन की चाह हो, उनकी जरूरत तो अलग हो गई; अन्यथा आप ही बताइए, महज दो-चार मिनट अपना श्रीमुख खोलने के लिए दो घंटे बरबाद करने का शौक कोई कब तक निभा सकता है? (स्रोत-एफबी)
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