
अखबारों में पेज थ्री आया तो पेज थ्री पत्रकारिता का दौर शुरू हुआ. लेकिन पेज थ्री कवर करते - करते खुद पत्रकार ही पेज थ्री बन गए और इसका बड़ा नमूना विनोद दुआ, वीरसांघवी और ऐसे कई पत्रकार हैं जिनकी लिस्ट बड़ी लंबी है.
पेज थ्री के ये पत्रकार कॉर्पोरेट और सरकार की कड़ी बन गए हैं. इनके लिए सबसे बड़ा धर्म अपनी सुविधा है. ये महफ़िलों में गाते हैं , खाते हैं , लेकिन किसी सरोकारी सेमिनार में नहीं जाते.
वैसे कॉरपोरेट पत्रकारिता का सबसे सुन्दर चेहरा विनोद दुआ है. उन्हें सिर्फ खाते, गाते और माय स्कूल कैम्पेन करते देख बेहद निराशा होती है. खासकर ऐसे समय में जब देश जल रहा हो. ऐसे में पुराने विनोद दुआ रह - रह कर याद आ जाते हैं.
लेकिन याद कर के कोई फायदा नहीं क्योंकि कॉरपोरेट और सुविधाभोगी पत्रकारिता में वे बहुत आगे निकल चुके हैं. और कई बार ऐसा लगता है जैसे कि राजनीतिक खबरों से इरादतन उन्होंने संन्यास ही ले लिया है ताकि उनकी पेज थ्री साधना में कोई व्यवधान न पैदा हो.
ऐसे में ये कहना गलत नहीं होगा कि पत्रकारिता में योग्यता है लेकिन जज्बा नहीं तो वह योग्यता लोगों के किसी काम का नहीं. विनोद, दुआ, वीर सांघवी आदि बहुतेरे ऐसे पत्रकार हैं जो काबिल तो हैं लेकिन यह काबिलियत लोगों के किसी काम का नहीं.
ये लोग पेज थ्री का हिस्सा बन चुके हैं और उनका बर्ताव भी पेज थ्री जैसा हो गया है. ऐसे में क्या भय?
