फेसबुक के ज़माने में पास से दूर, दूर के पास !
तारकेश कुमार ओझा अंकल सीरियस ... कम शून...। भैया बीमार - चले आओ...। टेलीफोन, मोबाइल व इंटरनेट से वंचित उस दौर में तब अपनों को याद करने का एक ही जरिया होता था टेलीग्राम । जिसका पाने वालोें पर बड़ा मारक असर होता था। इसके आते ही प्राप्तकर्ता के घर में सनसनी फैल जाती थी कि पता नहीं कैसा संदेशा आया है। ल...
