पुस्तक समीक्षा - जीवन का मूल स्वर है दर्द का कारवॉं
कुमार कृष्णन आम जीवन की बेबाकी से जिक्र करना और इसकी विसंगतियों की सारी परतें खोल देना यह विवेक और चिंता की उंचाईयों का परिणाम होता है। आज जो साहित्य रचा जा रहा है,वह लेखन की कई शर्तों को अपने साथ लेकर चल रहा है। एक तरफ जिन्दगी की जहां गुनगुनाहट है,वहीं दूसरी तरफ जवानी को बुढ़ापे में तब्दील होने की...
